भिखारन

एक पतले से चादर में वो
लिपटी थी, सहमी सी - सकुचाई सी
आज भी याद है मुझे पूस की वो रात
मिली थी जब वो सिमटी सी - शरमाई सी।

ट्रेन से उतर मैं उस ओर जा रहा ही था
की अचानक नज़र पड़ गई उस पर
न जाने क्या हो गया मुझे-
जाने क्या खिंचाव था उसमे - मैं उस ओर चलता चला गया।

छरहरा बदन, गोरी नही तो गेंहुमी तो जरूर होगी
मासूम चेहरा, नीची निगाहें
अपने जीवन के ताने बने को सुलझाते - सुलझाते
घिस गए थे उसके हाथ पांव।

सत्रह सावन भी शायद पार न की हो शायद
पर बिखरे हुए बाल उसकी उम्र को बढाते थे
चीथड़ों पे बैठी हुई न जाने क्या सोच रही थी वो
अपने भाग्य के विधाता को शायद कोस रही हो।

मुझसे रहा न गया तो जाकर पूछ ही लिया मैंने
"यहाँ क्यूँ बैठी है? बाप कहाँ है तेरा?"
अचानक जैसे तंद्रा भंग होने पर उसकी आँखें खुली
अपनी व्यथा भरी आंखों से उसने मुझे दो पल देखा
और बोल पड़ी "रहने दो बाबूजी - मैं भिखारन न हूँ।"

Bookmark and Share

2 Comments:

Mou... said...

u wrote this?? this is very good.

Paritosh said...

Yup.. I wrote this in my school days. I saw this girl at the Bokaro railway station. It was a very awkward experience and I wanted to make sense out of it. Not that this poem helped but still it has become one of the relics from my DPS days.